देवताओं के प्रमि भय, आश्चर्य और पूजा का

देवताओं के प्रमि भय, आश्चर्य और पूजा का भाव अपना लिया, उनकी स्तुति में गीत गाया, उन्हें प्रसन्न करने तथा उनका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उनकी उपासना किया और उन्हें बलि प्रदान किया। यह एक प्रकार का प्राकृ तिक बहदेववाद है जिसमें विलक्षण भौतिक घटनाओं को दैवीय स्वरूप प्राप्त हुआ ।

वैदिक संहिता में आये नये-पुराने देवताओं की संख्या अनिश्चित है। कभी-कभी उनकी संख्या तैंतीस मानी गयी। उन्हें निवासस्थान के अनुसार ग्यारह-ग्यारह के तीन वर्गों में रखा गया-आकाशस्थ देवता, अन्तरिक्षस्थ देवता और पृथ्वीस्थ देवता। मित्र और वरूण आदि आकाशस्थ देवता माने गये, इन्द्र और मरुत् इत्यादि को अन्तरिक्षस्थ देवता तथा अग्नि और सोम, आदि को पृथ्वीस्थ देवता स्वीकार किया गया। चूँकि वैदिक देवमण्डल के सभी देवता मूलतः प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, अतः इसे ‘प्राकृतिक बहुदेववाद’ के रूप में जाना गया।

एकेष्टेश्वरवाद (Henotheism) मैक्समूलर महोदय ने वैदिक बहुदेववाद और एकेश्वरवाद की कड़ी के रूप में ‘एकष्टश्वरवाद’ की कल्पना किया। उसके अनुसार वैदिक ऋषि एकेश्वरवाद पर पहुँचने के पूर्व एकेष्टेश्वरवाद पर पहुँचे। मैक्समूलर का कथन है कि ऋग्वेद की स्तुतियों से ज्ञात होता है कि वैदिक ऋषि जिस समय जिस विशेष देवता की स्तुति करते थे उस समय उसके महत्व को अत्यधिक बढ़ा देते थे तथा अन्य देवताओं की बिल्कुल उपेक्षा करते हुए उसे सर्वश्रेष्ठ घोषित करते थे। उसके अनुसार यह एकेश्वरवाद एक पहुँचने की सीढ़ीमात्र है, कोई अन्तिम सिद्धान्त नहीं है।

एकेश्वरवाद (Monotheism) यद्यपि ऋग्वेद के मन्त्रों में बहुदेववाद की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तथापि वैदिक ऋषियों की अभिलाषा बहुदेववाद की देवमाला से सन्तुष्ट न हो सकी, क्योंकि यह धार्मिक चेतना के विरूद्ध है। उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं के अलग-अलग कारण की खोज न करके उनके प्रथम कारण या आदि कारण की खोज में रूचि लिया। वैदिक ऋषि उस खोज की प्रक्रिया में एकेश्वरवाद पर पहुँचे। उन्होंने देवताओं में एक ही सर्वोच्च देवता को ढूँढ़ने के बजाय उनके पीछे काम करने वाली सामान्य शक्ति को ढूँढ़ने का प्रयास किया। हमें इस प्रवृत्ति की पूर्ण अभिव्यक्ति उस स्थल पर दिखाई देती है जहाँ वैदिक ऋषि कहता है कि सत केवल एक है और विप्र लोग उसे अग्नि, यम और मातरिश्वन आदि नामों से पुकारते हैं’ (एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति । अग्निं यमं मातरिश्वा नामाहः)। ईश्वर की एकात्म धारणा में पहुँचने का बीज हमें ‘विश्वेदेवा सूक्त’ में दिखाई देता है जिसमें सभी देवताओं को समष्टि रूप में ‘विश्वेदेवा’ कहा गया है। ऋत की अवधारणा भी एकेश्वरवाद का अनुभव कराने में सहायक सिद्ध हुई। प्राकृतिक नियमों में विश्वास ही एक ईश्वर में श्रद्धा का भाव उत्पन्न करता है। इस प्रकार ईश्वर के प्रति आदर्शवादी प्रवृत्ति, धार्मिक तर्क की आवश्यकता और नैतिकता की पूर्वमान्यता (ऋत) ने वैदिक ऋषियों को एकेश्वरवाद पर पहुँचा दिया।

अद्वैतवाद (Monism) एकेश्वरवादी अवधारणा भी पूर्ण एकत्व को प्राप्त करने की वैदिक ऋषियों की पिपासा को शान्त नहीं कर सकी। इस धारणा ने देवताओं में एकत्व तो लाया, अनेक देवताओं के स्थान पर उस एक देवता की आवश्यकता पर बल दिया जो विश्व की सृष्टि करता है, उसका संचालन करता है, जो उससे ऊपर तथा पृथक भी है। चूंकि इस धारणा में भी ईश्वर और प्रकृति में भेद बना रहा, अतः इसमें भी द्वैतवाद नहीं समाप्त हो सका। इस कारण वैदिक ऋषियों ने और गहराई से विचार किया तथा अद्वैतवाद की खोज किया। यद्यपि अद्वैतवाद की निश्चित विचारधारा उपनिषदों में प्राप्त होती है, तथापि इसके कुछ विचार बीज रूप में वैदिक संहिताओं में भी उपलब्ध होते हैं। ऋग्वेद में अद्वैतवादी विचारधारा के दो रूप प्राप्त होते हैं

___ प्रथम, सर्वेश्वरवादी विचारधारा, जिसमें प्रकृति का ईश्वर से अभेद कर दिया जाता है। इसमें ईश्वर और प्रकृति के उस भेद का निषेध हो गया जो एकेश्वरवाद में दिखाई देता है। इसमें ईश्वर को विश्व से अतीत नहीं, बल्कि विश्व में व्याप्त बताया गया। इस प्रवृत्ति का दूसरा महत्त्वपूर्ण उदाहरण ऋग्वेद का पुरूष सूक्त है जिसमें कहा गया कि ‘पुरूष ही एकमात्र सत् है।

भारतीय दर्शन की मुख्य प्रवृत्ति आध्यात्मिक है। उपनिषद् भारतीय दर्शन के आध्यात्मवाद का प्रतिनिधित्व करता है। जब तक भारतीय दर्शन में आध्यात्मवाद की सरिता प्रवाहित होगी तब तक उपनिषद् दर्शन का महत्त्व जीवित रहेगा। अतः उपनिषद् का शाश्वत महत्त्व है।

ब्रम्ह-विचार उपनिषदों के अनुसार ब्रम्ह ही परम तत्त्व है। वह ही एकमात्र सत्ता है। वह जगत् का सार है। वह जगत् की आत्मा है। ब्रम्ह’ शब्द ‘वृह’ धातु से निकला है जिसका अर्थ है बढ़ना या विकसित होना। ब्रम्ह को विश्व का कारण माना गया है। इससे विश्व की उत्पत्ति होती है और अन्त में विश्व ब्रम्ह में विलीन हो जाता है। इस प्रकार ब्रम्ह विश्व का आधार है।

उपनिषदों में ब्रम्ह के दो रूप माने गये हैं। वे हैं-(1) पर ब्रम्ह, (2) अपर ब्रम्ह । पर ब्रम्ह असीम, निर्गुण, निर्विशेष, निष्प्रपंच तथा अपर ब्रम्ह ससीम, सगुण, सविशेष एवं सप्रपंच है। पर ब्रम्ह अमूर्त है जबकि अपर ब्रम्ह मूर्त है। पर ब्रम्ह स्थिर है जबकि अपर ब्रम्ह अस्थिर है। पर ब्रम्ह की व्याख्या ‘नेति नेति’ कहकर की गई है जबकि अपर ब्रम्ह की व्याख्या ‘इति इति’ कहकर की गई है। पर ब्रम्ह को ब्रम्हा (Absolute) तथा अपर ब्रम्ह को ईश्वर (God) कहा गया है। सच तो यह है कि पर ब्रम्ह और अपर ब्रम्ह दोनों एक ही ब्रम्ह के दो पक्ष हैं। उपनिषदों का ब्रम्ह एक और अद्वितीय है। वह द्वैत से शून्य है। उसमें ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं है। एक ही सत्य है। नानात्व अविधा के फलस्वरूप दीखता है इस प्रकार उपनिषदों के ब्रम्ह की व्याख्या एकवादी (monistic) कही जा सकती है।

ब्रम्ह कालातीत (timeless) है। वह नित्य और शाश्वत है। वह काल के अधीन नहीं है। यद्यपि ब्रम्ह । कालातीत है फिर भी वह काल का आधार है। वह अतीत और भविष्य का स्वामी होने के बावजूद त्रिकाल से परे माना गया है। ब्रम्ह दिक की विशेषताओं से शून्य है। उपनिषद् में ब्रम्ह के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह अणु से अणु और महान् से महान् है। वह किसी भी दिशा में सीमित नहीं है। इस प्रकार ब्रम्ह दिक से परे होने पर दिक का आधार है।

ब्रम्ह को उपनिषद् में अचल कहा गया है। वह अचल होकर भी गतिशील है। यद्यपि वह स्थिर है फिर भी वह घूमता है। वह अचल है परन्तु सबों को चलायमान रखता है। वह यथार्थतः गतिहीन है और व्यवहारतः गतिमान् है। ब्रम्ह कारण से परे है। इसीलिए वह परिवर्तनों के अधीन नहीं है। वह अजर, अमर है। परिवर्तन मिथ्या है। वह कारण से शून्य होते हुए भी व्यवहार जगत् का आधार है। ब्रम्ह को ज्ञानम् माना गया है।

उपनिषद् में ब्रम्ह की निषेधात्मक व्याख्या पर जोर दिया गया है। वृहदारण्यक उपनिषद् में ‘नेति नेति’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। याज्ञवलक्य ने कहा है “ब्रम्ह न यह और न वह है (नेति नेति) | हम सिर्फ यह कह सकते हैं कि ब्रम्ह क्या नहीं है, हम यह नहीं कह सकते कि वह क्या है। ब्रम्ह की व्याख्या नकारात्मक शब्दों में वृहदारण्यक उपनिषद् में इस प्रकार की गई है “वह स्थूल नहीं है, सूक्ष्म नहीं है, लघु नहीं है, दीर्घ नहीं है, छायामय नहीं है, अन्धकारमय नहीं है। वह रस तथा गन्ध से विहीन है। वह नेत्र तथा कान से विहीन है। उसमें वाणी नहीं है, श्वास नहीं है। उसमें न अन्दर है और न बाहर। तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रम्ह को ‘वाणी’ एवं ‘मन’ से परे बतलाया गया है। इस प्रकार ‘नेति नेति’ सिद्धान्त के द्वारा ब्रम्ह की अनिर्वचनीयता का बोध होता है। ब्रम्ह की अनिर्वचनीयता से यह निष्कर्ष निकालना कि ब्रम्ह असत् है भ्रामक होगा। ‘नेति नेति’ से ब्रम्ह के गुणों का निषेध होता है, ब्रम्ह का नहीं।

ब्रम्ह अनन्तम् है। वह सभी प्रकार की सीमाओं से शून्य है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि ब्रम्ह अज्ञेय (unknowable) है सर्वथा गलत होगा। उपनिषद् में ब्रम्ह को ज्ञान का आधार कहा गया है। वह ज्ञान का विषय नहीं है। यद्यपि उपनिषद् में ब्रम्ह को निर्गुण कहा गया है परन्तु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि ब्रम्ह गुणों से शून्य है अनुचित होगा। ब्रम्ह के तीन स्वरूप लक्षण बतलाये गये हैं। वह विशुद्ध सत्, विशुद्ध चित् और विशुद्ध आनन्द है। जिस सत्, चित् और आनन्द को हम व्यावहारिक जगत् में पाते हैं वह ब्रम्ह का सत्, चित् और आनन्द नहीं है। ब्रम्ह का सत् सांसारिक सत् से परे है। उसका चित् ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से परे है। ब्रम्ह, स्वभावतः सत्, चित् और आनन्द है। अतः उपनिषद् में ब्रम्ह को ‘सच्चिदानन्द’ कहा गया है।

कतिपय कर्म ऐसे हैं जो सुदूर भविष्य में अपना फल प्रदान करते हैं। यज्ञ, आदि इसी प्रकार के कर्म हैं। वर्तमान में किया गया यज्ञ, आदि कर्म भविष्य में अपना परिणाम तभी दे सकता है जब वह समाप्त होने के पूर्व किसी अदृष्ट परिणाम को जन्म दे सके। महर्षि जैमिनि इस प्रकार की अदृष्ट शक्ति को ‘अपूर्व’ कहते हैं जो समयानुसार यज्ञ के कर्त्ता को उसके कर्मों का फल प्रदान करता है। अपूर्व के आधार पर ही आत्मा को सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं। कुमारिल के अनुसार अपूर्व प्रधान कर्म में अथवा कर्त्ता में एक योग्यता है जो कर्म के करने से पूर्व नहीं थी। अपूर्व कर्म के द्वारा उत्पन्न निश्चित शक्ति है जो उसके फल तक पहुँचाती है। अपूर्व सिद्धान्त सार्वभौम नियम है जो मानता है कि बाधाओं के दूर हो जाने पर प्रत्येक वस्तु में निहित शक्ति कुछ न कुछ फल अवश्य देगी। अपूर्व को संचालित करने के लिए ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। यह स्वचालित है। समीक्षा

1. वेदान्त दर्शन का कथन है कि प्रत्येक कर्म चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो, बिना किसी मनोभावना के यान्त्रिक रूप से किया जाता है, अतः वह स्वतः मोक्ष के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। कर्मकाण्ड अधिकतर हानिकारक है, क्योंकि उसमें मिथ्या विश्वास का भाव रहता है। हम कितने ही यज्ञ क्यों न करें, यह सम्भव है कि वे आन्तरिक भावना में कोई परिवर्तन न ला सकें। यदि धर्म से तात्पर्य नैतिक सुधार या आत्मत्याग से है तो आवश्यकता स्वार्थत्याग की है, कर्मकाण्ड सम्बन्धी यज्ञ की नहीं।

___ 2. वेदान्त दर्शन मीमांसा के अपूर्व सिद्धान्त की आलोचना करता है। शंकराचार्य के अनुसार अपूर्व की अवधारणा अभौतिक नहीं है। यह तब तक कार्य नहीं कर सकता जब तक इसका संचालक कोई आध्यात्मिक तत्त्व न हो।

अद्वैतवाद

ब्रह्मविचार शंकराचार्य के अद्वैतवाद का प्रतिपाद्य विषय ब्रह्म की एकमात्र सत्ता की स्वीकृति है। अद्वैतवाद की तत्त्वमीमांसा में ब्रह्म ही एक मात्र सत् है, जगत् मिथ्या है और जीव भी परमार्थतः ब्रह्म है, ब्रह्म से भिन्न नहीं है। अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म के दो लक्षण प्राप्त होते हैं-तटस्थ-लक्षण और स्वरूप-लक्षण।

तटस्थ-लक्षण- अद्वैत वेदान्त में ‘सृष्टि-कर्त्तव्य’ ब्रह्म का तटस्थ लक्षण माना जाता है। शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र के द्वितीय सूत्र ‘जन्मायस्य यतः’ की व्याख्या में इसी तथ्य को उद्घाटित किया है। उनका कथन है कि, इस जगत् का जन्मादि (जन्म, धारण और विनाश) जिस तत्त्व से होता है वह ब्रह्म है। उन्होंने दिखाया कि श्रुतियाँ भी ब्रह्म को जगत् का कारण बताती हैं। उन्होंने श्रुतिवाक्यों की व्याख्या करते हुए उद्घाटित किया है कि जिससे ये सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं, वे जिसके सहारे जीवित रहते हैं और अन्ततः वे जिसमें विश्वासपूर्वक विलीन हो जाते हैं वह ब्रह्म है। उन्होंने श्रुतियों से अपने अभीष्ट मत का समर्थन करने के बाद तर्क द्वारा भी उसे पुष्ट करने का प्रयास किया। वे ब्रह्मसूत्रभाष्य में इस प्रसंग में अन्य सृष्टिविषयक सिद्धान्तों-सांख्य दर्शन के ‘प्रकृति-परिणामवाद’, न्याय–वैशेषिक दर्शन के ‘परमाणुवाद’ और अद्वैतेतर वेदान्तियों के ‘ब्रह्मपरिणामवाद’ को तार्किक दृष्टि से असन्तोषजनक सिद्ध करते हैं और ब्रह्म को ही जगत् का एकमात्र कारण सिद्ध करते हैं। इस अर्थ में ब्रह्म माया से संयुक्त है और वह ईश्वर कहलाता

है।

स्वरूप-लक्षण- शंकराचार्य ब्रह्म के स्वरूप लक्षण का कथन करके उसके वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करते हैं। वे इस दृष्टि से ब्रह्म को ‘सच्चिदानन्द’ कहते हैं। ब्रह्म सत् है, चित् है और आनन्द है। ये ब्रह्म के गुण या विशेषण नहीं हैं। इसके दो कारण हैं। प्रथम, ये शब्द भावार्थक न होकर अभावार्थक हैं। सत् से असत् की, चित् से अचित् (जड़) की और आनन्द से अपूर्णता या दुःख की व्यावृत्ति होती है। अर्थात् इनसे यह सूचित होता है कि ब्रह्म असत्, अचित और अपूर्ण नहीं है। द्वितीय, ब्रह्म में सब प्रकार के भेदों का अभाव होने के कारण उसमें विशेष्य-विशेषणभाव की कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः सत्, चित् और आनन्द ब्रह्म के गुण नहीं हैं, अपितु स्वरूप हैं। वह सत्स्वरूप, चित्स्वरूप और आनन्दस्वरूप है, किंवा, सच्चिदानन्दस्वरूप है। सत्, चित् और आनन्द तीन नहीं है, ये एक ही हैं। ये तात्विक रूप में एक हैं। जो सत् है, वही चित् है, वही आनन्द है।

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